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Showing posts from November, 2021

भीष्म पितामह की इच्छा मृत्यु का रहस्य — उत्तरायण का महत्व

 भीष्म पितामह ने अपना शरीर 58 दिन बाद क्यों त्याग किया? — शास्त्रों से गहरा रहस्य जब हम धर्म, त्याग और प्रतिज्ञा की बात करते हैं, तो सबसे पहले जिस महान आत्मा का नाम आता है वह हैं भीष्म पितामह। महाभारत के युद्ध में बाणों की शरशैया पर लेटे हुए भी उन्होंने जीवन का ऐसा अद्भुत उदाहरण दिया जो आज भी हमें धैर्य, ज्ञान और भक्ति का मार्ग दिखाता है। लेकिन एक प्रश्न हमेशा मन में उठता है — 👉 उन्होंने 58 दिन तक शरीर क्यों नहीं छोड़ा?  सरल उत्तर — इच्छा मृत्यु का वरदान भीष्म पितामह को उनके पिता महाराज शांतनु ने “इच्छा मृत्यु” का वरदान दिया था। इसका अर्थ था कि वे जब चाहें तभी शरीर त्याग सकते थे। महाभारत युद्ध में अर्जुन के बाणों से घायल होने के बाद भी उन्होंने तुरंत शरीर नहीं छोड़ा क्योंकि वे सही समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। 📜  शास्त्रीय संदर्भ यह प्रसंग मुख्य रूप से महाभारत के भीष्म पर्व और शांति पर्व में वर्णित है। शास्त्रों के अनुसार, भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने तक प्राण रोके रखे। उत्तरायण को देवताओं का दिन और मोक्ष का द्वार माना गया है। ☀️  उत्तरायण का आध्यात्मिक महत...

Who is Deva of Muladhar chakra?

 Who is Deva of the Muladhar chakra? Deity Ganesha is the supreme of Muladhar chakra. Its base sound is Lam. It's colour is red. This chakra is supposed to be power house of energy. When Muladhar chakra get activated several dimensions opens up for the person . After activation one’s sexual activity get controlled. Person becomes optimistic to know beyond physicality. There is much chances of self realisation because when Muladhar chakra get activated respectively, all chakras get activated. For this immense Sadhna requires. Only then it can happen. Worship deity Ganesha. Jai Ganesh 🙏🌹🏵️

क्या भगवान के बिना जीवन है?

      क्या भगवान के बिना जीवन है? ईश्वर के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। बिना भगवान का मतलब आत्मा के बिना' भगवान, दूसरे शब्दों में देवता इस ब्रह्मांड में व्यापक और सर्वव्यापी रूप है। मुख्य बात तो यह है ,की हमारा अस्तित्व ही नहीं रहेगा। क्योंकि दिव्य ऊर्जा जो हमारे शरीर में निवास करता है । वह और कोई नहीं चेतना स्वरूप भगवान ही है। अगर भगवान के लिए भक्ति  हमारे शरीर में नहीं है तो हम पशु बन जाएंगे, पशु जैसा व्यवहार करेंगे। हमारी नैतिकता पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगी, हम राक्षस की तरह व्यवहार करना शुरू कर देंगे। प्यार, करुणा, चरित्र, गायब हो जाएगा। हम अपने मन के, तथाकथित  इन्द्रियों के भी दास होंगे। * हम क्रोध, काम, घृणा, हिंसा आदि से भरे रहेंगे। अगर ये चीजें हम में रहती हैं, तो विनाश की ओर एक कदम बढ़ जाएगा। इसीलिए अध्यात्म और ईश्वर है ,हमारे जीवन में ,जो हमे , नैतिकता और चेतना को दृढ़ करने में सहायता करते है। देवता परम रूप हैं, जो हममें निवास करते हैं। और हमारे तन को प्रकाशित करते हैं ,जिससे यह अंतिम क्षण तक अस्तित्व में रहता है। सर्वोच्च देवता आशीर्वाद देते ह...