भीष्म पितामह की इच्छा मृत्यु का रहस्य — उत्तरायण का महत्व

 भीष्म पितामह ने अपना शरीर 58 दिन बाद क्यों त्याग किया? — शास्त्रों से गहरा रहस्य जब हम धर्म, त्याग और प्रतिज्ञा की बात करते हैं, तो सबसे पहले जिस महान आत्मा का नाम आता है वह हैं भीष्म पितामह। महाभारत के युद्ध में बाणों की शरशैया पर लेटे हुए भी उन्होंने जीवन का ऐसा अद्भुत उदाहरण दिया जो आज भी हमें धैर्य, ज्ञान और भक्ति का मार्ग दिखाता है। लेकिन एक प्रश्न हमेशा मन में उठता है — 👉 उन्होंने 58 दिन तक शरीर क्यों नहीं छोड़ा?  सरल उत्तर — इच्छा मृत्यु का वरदान भीष्म पितामह को उनके पिता महाराज शांतनु ने “इच्छा मृत्यु” का वरदान दिया था। इसका अर्थ था कि वे जब चाहें तभी शरीर त्याग सकते थे। महाभारत युद्ध में अर्जुन के बाणों से घायल होने के बाद भी उन्होंने तुरंत शरीर नहीं छोड़ा क्योंकि वे सही समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। 📜  शास्त्रीय संदर्भ यह प्रसंग मुख्य रूप से महाभारत के भीष्म पर्व और शांति पर्व में वर्णित है। शास्त्रों के अनुसार, भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने तक प्राण रोके रखे। उत्तरायण को देवताओं का दिन और मोक्ष का द्वार माना गया है। ☀️  उत्तरायण का आध्यात्मिक महत...

सिद्धार्थ (गौतम) कैसे बने भगवान् बुद्ध?

 सिद्धार्थ (गौतम) कैसे बने भगवान् बुद्ध?


  • भगवान् बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व नेपाल के लुंबिनी में हुआ था।इनका पिता का नाम शुद्धोधन तथा माता का नाम मायादेवी देवी था। इनके जन्म के सातवें दिन बाद ही इनके माता का देहांत हो गया।इनका लालन पालन प्रजापति गौतमी ने की।आगे चलकर बौद्ध धर्म में दीक्षा ली।ऐसा कहा जाता है,इनकी माता ने जन्म से पूर्व स्वप्न में हाथी का दृश्य देखा था।इससे स्पष्ट हो गया,कोई महान आत्मा का आगमन होने वाला है।
  • उनके जन्म के बाद ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की या तो एक महान शासक बनेगा,या फिर वैराग्य भावना आने पर एक महान दार्शनिक,उपदेशक, धर्म , सत्य,ओर अहिंसा का प्रवर्तक बनेगा।


  • इस भविष्यवाणी के बाद इनके पिता ने यह संकल्प लिया कि सिद्धार्थ को सांसारिक दुखों से दूर रखूंगा ओर भोग - विलासिता जीवन में कोई कमी नहीं होने दूंगा। सिद्धार्थ ने अपने बचपन ओर गृहस्थ का ज्यादातर समय महल में ही बिताए।
  • उन्होंने यशोधरा के साथ विवाह किया ओर उनके एक पुत्र भी हुए ,जिसका नाम राहुल था ।
कुछ समय बाद सिद्धार्थ ने महल से बाहर की दुनिया को देखने की इच्छा प्रकट की। अपने अनुचर को चलने   के लिए विवश कर दिया।
  • वे महल से निकलकर कपिलवस्तु की सैर के लिए निकले।
इस दौरान उन्होंने कई दृश्य ओर जीवन के सत्य को देखा।
  • उन्होंने बूढ़ा व्यक्ति, सन्यासी, रोगी ओर एक शव को जाते देखा। यही से सिद्धार्थ को सांसारिक जीवन से वैराग्य भावना आ गया।
  • उन्होंने महल जाने के बाद अपनी पत्नि ओर बेटे राहुल से आखिरी बार मुलाकात किए।ओर उनको सोए हुए अवस्था में छोड़कर मध्य रात्रि में महल का त्याग किया। इसे बोध धर्म में महाभिनिष्क्रमण कहा गया है।
  • उन्होंने अलारकलाम को प्रथम गुरु बनाया।ओर उनसे सांख्य दर्शन की शिक्षा ग्रहण की।
6 वर्ष की कठिन तपस्या के बाद उनका शरीर क्षीण पर गया ।


  • कुछ  स्त्रियां पास से गुजर रही थी, जहां बुद्ध बैठे हुए थे ।ओर बोली जा रही थी।"वीणा के तार को ज्यादा ढीला छोड़ देने से स्वर मधुर नहीं निकलता,ओर ज्यादा
कसने से टूट ही जाता है"।
बुद्ध के कानों में जैसे ही यह बात पहुंची , उन्होंने मध्यम मार्ग का अनुसरण करना ही बेहतर समझा।इस कारण से उन्हें बहुत से शिष्य छोड़कर भी चले गए।
  • एक दिन वे पीपल वृक्ष के नीचे बैठे हुए थे ,एक सुजाता नाम की स्त्री वहां पर आईं और सिद्धार्थ को खीर भेट की ओर बोली जैसे मेरी मनोकामना पूर्ण हुई , वैसे ही आपका भी पूर्ण हो। उसी बैशाख पूर्णिमा की रात उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई।इसके बाद से सिद्धार्थ , भगवान् बुद्ध बन गए।
उन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की , उनके बहुत से अनुयायी भी बने। 
बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया।आगे चलकर बौद्ध धर्म का प्रचार बहुत जोर शोर से हुआ।
  • सम्राट अशोक, बिंबिसार, कनिष्क (चीनी शासक भारत में), जैसे बौद्ध अनुयायी ने बौद्ध धर्म को नेपाल, चीन, भूटान,जापान,श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, थाईलैंड,ओर अन्य देशों में फैलाया।
*भगवान् बुद्ध ने अपना उपदेश मध्यम मार्ग पर ओर पालि भाषा में दिए।
*बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म को सत्य बताया है।
भगवान् बुद्ध ने अपना अंतिम जन्म शाक्य मुनि के रूप में लिया था।ओर मैत्रेय रूप में जन्म अभी शेष है।
*सांसारिक कष्ट से मुक्ति हेतु बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग को बताया है।
*सम्यक(सही) दृष्टि
*सम्यक संकल्प
*सम्यक वाणी
*सम्यक आजीव
*सम्यक कर्म
*सम्यक योग
*सम्यक ज्ञान
*एवं सम्यक समाधि

*भगवान् बुद्ध ने संसार को दुखों से भरा बताया है।

*इन्होंने शरीर त्यागते समय अपने शिष्यों से कहा,
अपो दीपो भव: , इसका मतलब है , अपना दीपक स्वयं बनो।तुम सभी बुध ही हो।
*भगवान् बुद्ध ने 483 ईसा पूर्व में अपने शरीर का त्याग किया। जिसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा गया है।
*बुद्ध, भगवान् विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक माने जाते है।
*बुद्ध धर्म के मंत्र।
ॐ सोमपुत्राय विद्महे, महाप्रघ्याय धीमहि, तन्नो बुद्ध प्रचोदयात्।।
ॐ बुद्धम शरणं गच्छामि।
धम्म शरणं गच्छामि।
सङ्घंग शरणं गच्छामि।।द्र्र्दिि्द्






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