भीष्म पितामह की इच्छा मृत्यु का रहस्य — उत्तरायण का महत्व

 भीष्म पितामह ने अपना शरीर 58 दिन बाद क्यों त्याग किया? — शास्त्रों से गहरा रहस्य जब हम धर्म, त्याग और प्रतिज्ञा की बात करते हैं, तो सबसे पहले जिस महान आत्मा का नाम आता है वह हैं भीष्म पितामह। महाभारत के युद्ध में बाणों की शरशैया पर लेटे हुए भी उन्होंने जीवन का ऐसा अद्भुत उदाहरण दिया जो आज भी हमें धैर्य, ज्ञान और भक्ति का मार्ग दिखाता है। लेकिन एक प्रश्न हमेशा मन में उठता है — 👉 उन्होंने 58 दिन तक शरीर क्यों नहीं छोड़ा?  सरल उत्तर — इच्छा मृत्यु का वरदान भीष्म पितामह को उनके पिता महाराज शांतनु ने “इच्छा मृत्यु” का वरदान दिया था। इसका अर्थ था कि वे जब चाहें तभी शरीर त्याग सकते थे। महाभारत युद्ध में अर्जुन के बाणों से घायल होने के बाद भी उन्होंने तुरंत शरीर नहीं छोड़ा क्योंकि वे सही समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। 📜  शास्त्रीय संदर्भ यह प्रसंग मुख्य रूप से महाभारत के भीष्म पर्व और शांति पर्व में वर्णित है। शास्त्रों के अनुसार, भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने तक प्राण रोके रखे। उत्तरायण को देवताओं का दिन और मोक्ष का द्वार माना गया है। ☀️  उत्तरायण का आध्यात्मिक महत...

हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार नारद कौन हैं?

हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार नारद कौन हैं?

आइए आपको बताते हैं महान ऋषि, पौराणिक ग्रंथों के महापुरूष, आचार्य महर्षि नारद के बारे में।
वह शायद पौराणिक पाठ में सबसे प्रमुख पात्र है। नारद जी हमेशा जप करते हैं,श्री हरि नारायण को प्रसन्न करने के लिए नारायण, नारायण, नारायण।

उन्होंने हमेशा भक्त को भगवान् से मिलने के लिए प्रेरित किया। गुरु के रूप में महान भक्त ध्रुव, प्रह्लाद, महर्षि वेदव्यास और कई शिष्यों को शिक्षा दी।

  • पौराणिक पहलुओं के अनुसार  नारद अपने पिछले जन्म में एक गंधर्व थे। एक दिन ब्रह्मा जी ने नारायण की महिमा का गुणगान करने के लिए  एक कार्यक्रम का आयोजन किया और देवताओं,गंधर्व, यक्ष आदि को आमंत्रित किया। सभी लोक, देव, गंधर्व, यक्ष और अन्य से कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आए।
  • एक गंधर्व , दिव्य स्त्री की ओर मोहित हो गए, इसलिए ब्रह्मा जी क्रोधित हो कर उस गंधर्व को शाप दिया," उन्हें नश्वर दुनिया में शूद्र कुल में जन्म लेना होगा"।
  • इसके बाद, उन्होंने दासी के पुत्र के रूप में जन्म लिया। दासी सदा साधु, संत, ओर वैष्णवों की सेवा करती थी। उनका बेटा भी उनकी सेवा के लिए पूरी तरह से समर्पित था। ऐसी सेवा पाकर ऋषि-मुनि प्रसन्न हुए।
  • आशीर्वाद के रूप में, उन्होंने मंत्र, आध्यात्मिक ज्ञान, ध्यान की तकनीकें दीं। जब ऋषि अपने निवास से विदा हुए। कुछ समय बाद उसकी मां की सांप के काटने से मृत्यु हो गई।
  • अब उसका पुत्र संसार से मुक्त हो गया। इसलिए वह ज्यादातर समय मंत्रों का जाप करते हुए ओर योग का अभ्यास करने में लगाते थे। एक दिन श्री हरि ने भक्त को अपना रूप दिखाया और आशीर्वाद दिया।
  • विशिष्ट समय पर उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया और ब्रह्मा जी में समा गए।
  • दूसरे कल्प में उन्होंने ब्रह्मा जी से, भगवान् हरि के आशीर्वाद से नारद जी के रूप में अवतार लिया।

वे हमेशा हर लोक में वीणा और खरताल यंत्रों से नारायण, नारायण और नारायण का जप करने लगे।ओर वे श्रीहरि नारायण के बहुत बड़े भक्त माने जाते है।
कुछ समय से फिल्म उद्योग द्वारा महर्षि नारद जी को नकारात्मक भूमिका के रूप में दिखाया जाने लगा है। यह बहुत ही दुख की बात है। उन्हें अपनी विचारधारा में सुधार करना होगा।
हमें एक महान महर्षि नारद की शिक्षाओं का पालन करना चाहिए, और सर्वोच्च देवता के प्रति समर्पित रहना चाहिए।
हरे कृष्णा। 
हमारे साथ जुड़ने के लिए बहुत - बहुत धन्यवाद।आपसे विनम्र निवेदन है कि मेरे ब्लॉग को फॉलो करें और अपने प्रिय मित्र को जरूर भेजें। 

Comments

Popular posts from this blog

राम नाम कैसे जपें?

बिहार की शिक्षा व्यवस्था।

क्या सच में भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया? कथा, रहस्य और आध्यात्मिक संदेश।