शिक्षा जो जीवन जीने की राह दिखाती है
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शिक्षा जो जीवन जीने की राह दिखाती है
(आध्यात्मिक ज्ञान, वर्तमान समय और मानव निर्माण की सच्ची दिशा)
🔶 क्या हम सच में शिक्षित हो रहे हैं?
हम सबने शिक्षा पाई है।
डिग्रियाँ ली हैं।
परीक्षाएँ पास की हैं।
पर एक प्रश्न मन को झकझोरता है —
क्या हमने जीवन जीना सीखा है?
आज का विद्यार्थी ज्ञान से अधिक अंक का भूखा है।
डिग्री है, पर दिशा नहीं। शुरुआत में, हमने भी इन विषयों को ज्यादा ही महत्व दिया।
रोज़गार की दौड़ है, पर जीवन का उद्देश्य धुंधला है।
शिक्षा यदि मनुष्य को मनुष्य न बना सके,
तो वह केवल सूचना है — ज्ञान नहीं।
🔶 शिक्षा का वास्तविक अर्थ क्या है?
शिक्षा केवल पुस्तकीय जानकारी नहीं।
शिक्षा वह है जो —
✔ विवेक जागृत करे
✔ चरित्र का निर्माण करे
✔ आत्मविश्वास दे
✔ समाज के प्रति उत्तरदायित्व सिखाए
✔ व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाए
आज की शिक्षा व्यवस्था में जानकारी है,
लेकिन जीवन का मार्गदर्शन नहीं।
🔶 सनातन परंपरा में शिक्षा का स्वरूप
प्राचीन भारत में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं था।
गुरुकुलों में शिक्षा का आधार था —
आत्मसंयम
कर्तव्यबोध
शारीरिक क्षमता
मानसिक स्थिरता
आध्यात्मिक जागरूकता
ऋषि-मुनियों ने शिक्षा को साधना माना।
इसी शिक्षा से हम श्रीराम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम को देख पाए।
इसी से श्रीकृष्ण जैसे योगेश्वर का व्यक्तित्व विकसित हुआ।
उनकी शिक्षा केवल शास्त्र ज्ञान नहीं थी,
वह जीवन का संपूर्ण प्रशिक्षण था।
🔶 वर्तमान समय की चुनौती
आज की शिक्षा में कुछ गंभीर समस्याएँ दिखती हैं:
डिग्री प्राप्ति पर अधिक जोर दीया जा रहा है,
नैतिक मूल्यों की उपेक्षा की जा रही है
प्रतियोगिता की अंधी दौड़ सभी को एक जैसा बना रहा है
परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की कमी,
वास्तविक कौशल विकास का अभाव
विद्यार्थी ज्ञान अर्जन के बजाय प्रमाणपत्र अर्जन में विश्वास करने लगा है। समाज में अधिकांश लोगों के पास अनेकों degree है लेकिन उस तरह की ज्ञान अथवा समझ नही। शिक्षा ही कुछ उस हिसाब का है जो व्यवहारिकता से अलग है।
यह स्थिति केवल सरकार की नहीं,
समाज और परिवार की भी समान जिम्मेदारी है। जब समाज में इन विषयों के प्रति जागरूकता आएगा तभी सरकार भी इस पर काम करने का मन बनाएगा।
🔶 शिक्षा में आध्यात्मिक ज्ञान क्यों आवश्यक है?
जब शिक्षा में आध्यात्मिक आधार नहीं होता,
तो बुद्धि तो विकसित होती है,
परंतु चेतना अधूरी रह जाती है।
वेद, उपनिषद्, गीता — ये केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं,
ये मनुष्य के आंतरिक विकास के सूत्र हैं।
आध्यात्मिक शिक्षा से:
✔ मानसिक संतुलन बढ़ता है
✔ आत्मविश्वास विकसित होता है
✔ निर्णय क्षमता स्पष्ट होती है
✔ जीवन के उतार-चढ़ाव में धैर्य आता है
ऐसी शिक्षा व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है और परिस्थितियों से डट कर सामना करना सिखाती है।
🔶 जीवनोपयोगी शिक्षा कैसी हो?
शिक्षा ऐसी हो जो:
जीविका कमाने की योग्यता दे
आत्मरक्षा और शारीरिक दक्षता सिखाए
प्राथमिक चिकित्सा का ज्ञान दे
संकट में निर्णय लेने की क्षमता विकसित करे
समाज सेवा की भावना जगाए
सिर्फ नौकरी पाने के लिए नहीं,
बल्कि जीवन को सार्थक बनाने के लिए।
🔶 गहराई से समझें – शिक्षा और चरित्र
जब शिक्षा से चरित्र निर्माण होता है,
तो भ्रष्टाचार स्वतः घटता है।
जब शिक्षा में नैतिकता आती है,
तो समाज मजबूत होता है।
आरक्षण, नीति, प्रशासन — सब महत्वपूर्ण हैं,
परंतु यदि चरित्र निर्माण न हो,
तो व्यवस्था टिकाऊ नहीं बन सकती। इसलिए अध्यात्म दर्शन हमारे शिक्षा में जोड़ा गया है ताकि लोग गुणवान चरित्रवान हो।
🔶 आंतरिक परिवर्तन – शिक्षा का अंतिम लक्ष्य
सच्ची शिक्षा का उद्देश्य है —
भय से मुक्त करना
आत्मविश्वास जगाना
जीवन का उद्देश्य स्पष्ट करना
व्यक्ति को ईश्वर पर विश्वास दिलाना
जब विद्यार्थी यह समझ ले कि
वह केवल शरीर नहीं, चेतना है —
तभी शिक्षा पूर्ण होती है।
🔶 निष्कर्ष – सरकार से अधिक समाज की जिम्मेदारी
हम सबकी सरकार से विनम्र प्रार्थना है
कि शिक्षा के स्तर को सुधारने पर गंभीरता से कार्य हो।
पर साथ ही हमें भी आत्ममंथन करना होगा।
क्या हम अपने बच्चों को केवल अंक सिखा रहे हैं
या मूल्य भी दे रहे हैं?
शिक्षा जो जीवन जीना सिखाए,
वही सच्ची शिक्षा है।
वही समाज को उठाएगी।
वही राष्ट्र को दिशा देगी।
वही मनुष्य को मनुष्य बनाएगी।
और अंततः —
वही हमें भीतर से शांति और शक्ति देगी।
आपको यह article कैसा लगा कमेंट के माध्यम से हमे जरूर बताएं ।
धन्यवाद मिलते है अगले लेख में।
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