“Bhagavad Gita Lessons for Success: Life Changing Teachings”
भगवान् बुद्ध का जीवन हमेशा से ही मानवता और आध्यात्मिकता का अद्भुत उदाहरण रहा है। उनका जन्म 563 ईसा पूर्व नेपाल के लुंबिनी में हुआ था। उनके पिता का नाम शुद्धोधन और माता का नाम मायादेवी देवी था। जन्म के सातवें दिन ही उनकी माता का देहांत हो गया। उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी प्रजापति गौतमी ने संभाली।
जन्म से पहले ही उनके माता-पिता ने देखा कि सिद्धार्थ महान पुरुष के रूप में जन्म लेने वाले हैं। उनके स्वप्न में हाथी का दृश्य आया, जिससे ज्ञात हुआ कि यह शिशु महानता और आध्यात्मिकता का प्रतीक बनेगा। जन्म के बाद ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की — या तो वह महान शासक बनेंगे, या वैराग्य और ज्ञान की ओर अग्रसर होकर धर्म, सत्य और अहिंसा का प्रचार करेंगे, हुआ भी ठीक ऐसा ही।
अपने पिता की चिंता के कारण सिद्धार्थ को सांसारिक दुखों से दूर रखा गया। महल में उन्हें सभी विलासिताएँ और सुख सुविधाएँ उपलब्ध कराई गईं। उन्होंने यशोधरा से विवाह किया और उनका एक पुत्र राहुल हुआ।
लेकिन महल की सीमाओं ने सिद्धार्थ को बाहरी जीवन की सच्चाई देखने की जिज्ञासा बढ़ा दी। वह महल से बाहर निकले और कपिलवस्तु की सैर की। वहाँ उन्होंने जीवन के चार सत्य दृश्य देखे:
इन दृश्यों ने सिद्धार्थ के मन में सांसारिक जीवन की अनिश्चितता और दुखों की सच्चाई को उजागर किया और उन्हें वैराग्य की ओर अग्रसर किया।
सिद्धार्थ ने अपने घर, पत्नी और पुत्र को मध्यरात्रि में महल में छोड़कर सांसारिक जीवन की खोज में निकल गए। यह घटना बौद्ध धर्म में महाभिनिष्क्रमण के रूप में प्रसिद्ध है।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा के लिए आलारकलाम को गुरु बनाया और सांख्य दर्शन का अध्ययन किया।
सिद्धार्थ ने 6 वर्ष तक कठिन तपस्या की, जिससे उनका शरीर अत्यंत क्षीण हो गया। इस दौरान उन्होंने देखा कि अत्यधिक कष्ट या अत्यधिक सुख से जीवन संतुलित नहीं रहता। एक घटना ने उन्हें मध्यम मार्ग (Middle Path) अपनाने की प्रेरणा दी।
ऐसी कहावत है कि जब वे तपस्या कर रहे थे तो पास से गुजरती महिलाओं ने वीणा के तार की बात सुनाई, जिससे सिद्धार्थ ने यह समझा कि जीवन में न तो अत्यधिक कठोरता और न ही अत्यधिक ढीलापन लाभदायक है। हम सबको भी अपने जीवन में सरलता एवं मौलिकता लानी चाहिए। जो वास्तव में है वही बने रहे। इससे हमारा जीवन और आसान बन जायेगा।
बैशाख पूर्णिमा की रात, सुजाता नामक स्त्री ने सिद्धार्थ को खीर भेंट की। इसी दिन बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर सिद्धार्थ ने संपूर्ण ज्ञान को प्राप्त किया। इसके बाद वह भगवान् बुद्ध बन गए।
भगवान् बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना की और अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया। उनके उपदेशों का मूल मध्यम मार्ग और अष्टांगिक मार्ग है, जो सांसारिक दुखों से मुक्ति का मार्ग दिखाता है:
भगवान् बुद्ध के अनुयायी जैसे सम्राट अशोक, बिंबिसार, और कनिष्क ने बौद्ध धर्म को नेपाल, चीन, श्रीलंका, जापान, थाईलैंड, भूटान, और अन्य देशों में फैलाया।
भगवान् बुद्ध ने 483 ईसा पूर्व में अपना शरीर त्यागा। इसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा जाता है। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा:
बुद्ध ने संसार को दुखों से भरा बताया और शांति, अहिंसा, ज्ञान और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।
बहुत खूब 👌👌
ReplyDeleteबहुत खूब 👌👌
ReplyDeleteधन्यवाद, राधे राधे।
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